आगे की ज़िंदगी कुछ इस कदर जीना चाहते हैं❣️
हर सुबह की चाय साथ तुम्हारे पीना चाहते हैं ,,❣️
विवेक शुक्ला की कलम से ❣️
आगे की ज़िंदगी कुछ इस कदर जीना चाहते हैं❣️
हर सुबह की चाय साथ तुम्हारे पीना चाहते हैं ,,❣️
विवेक शुक्ला की कलम से ❣️
सबकुछ तो वही पुराना है फिर ये नयी सी खुमारी क्या है ,
दिल तो दुरुस्त है फिर ये धड़कनों की बीमारी क्या है ,,
बिना पूछे ही हमने तो बयां कर दी हालात अपनी ,
तुम भी कहो मोहब्बत में हालात तुम्हारी क्या है ,,
विवेक शुक्ला की कलम से
आसमानों में उड़ने को, हौसलों के पर रखते हैं ,
हम तूफानों से भी, लड़ने का जिगर रखते हैं
हमे लहरों का खौफ़ नहीं, हम भवँर में तैरने का हुनर रखते हैं
Motivational Quote , Motivational Shayari
आशिकों को अक्सर मिलता है सफर सलाखों का ,
हसीनाओं से बचकर रहना खेल बुरा है आँखों का ,,
विवेक शुक्ला की कलम से
उन्ही पुराने गीतों पर झूमता हूँ ,
आज भी तेरी गलियों में घूमता हूँ ,,
खरीद लिया है ठेला तेरे नाम का ,
तेरे शहर में ही पानीपुरी बेचता हूँ ,,
विवेक शुक्ला की कलम से
जगाकर अपनी रातों को , क्यों ख़्वाब चाहत के बुनता है ,,
मतलब के सारे साथी हैं , यहां किसे तुम्हारी चिंता है ,,
कहते हैं सब अपनी अपनी , है कौन तुझे जो सुनता है ,,
मन के एकाकीपन में , दिल सम्मति यही सब गुनता है ,,
विवेक शुक्ला की कलम से
मेरे शहर से जरा सी दूरी पर है भवन मेरा ,
रास्तों की खूबसूरती पर लगता है मन मेरा ,,
चाँद दिखता सफर में जब शहर में होता गमन मेरा ,
सुना है कल से अमावस होगी कैसे लगेगा मन मेरा ,,
विवेक शुक्ला की कलम से
माँ को समर्पित कविता
हे जन्मधात्री हे जन्मभूमि ये जीवन तुझको अर्पित है ,
तूने ही सब दिया है और सबकुछ तुझे समर्पित है ,,
जब जब विपदा आती तेरा आँचल करता रक्षा मेरी ,
शरण में वो भी आते हैं छोड़ गए जो सरजमीं तेरी ,,
हर रोग, व्याध दुःख दर्द से माँ तूने सदा बचाया है ,
हठ, क्रोध से अनजाने में हमने तुझे सताया है ,,
तुझी से पाते जन्म सभी पलता तुझसे संसार है ,
हे जन्मधात्री हे जन्मभूमि तेरा गौरव आपार है ,,
विवेक शुक्ला की कलम से
बिजली कटौती पर कविता
जो तुम हो पास तो ज़िंदगी में रोशनी है ,
वर्ना हर तरफ अंधेरा है गर्मी है बेचैनी है ,,
मगर न जाने कहाँ रहती हो तुम आजकल ,
इंतज़ार करते करते दिन जाता है निकल ,,
रात भर रहते हैं बेचैन तुम्हारे इंतज़ार में ,
आके भी तुम रुकती नहीं एकबार में ,,
24 घण्टे रहने के वादे थे अखबार में ,
भुला दिया तुमने आते ही सरकार में ,,
विवेक शुक्ला की कलम से
ये माना कि तुम्हारा हुस्न है जैसे अनारकली ,
लेकिन मोहब्बत की नजर सलीम को भी न मिली ,,
और तुमसे तो लाख गुना हमारी उर्वशी ही भली ,
बरसी मोहब्बत की नजर हर किसी पर गुजरा जो उस गली ,,