सत्य की जीत मनाते हैं वे भी विजयदशमी को ,
सदा असत्य से ही चलता जिनका धंधा रहा ,,
लोग जलाते रहे हर दफा कागज़ी पुतले को ,
रावण सबके मन के भीतर जिंदा रहा ,,
विवेक शुक्ला की कलम से
सत्य की जीत मनाते हैं वे भी विजयदशमी को ,
सदा असत्य से ही चलता जिनका धंधा रहा ,,
लोग जलाते रहे हर दफा कागज़ी पुतले को ,
रावण सबके मन के भीतर जिंदा रहा ,,
विवेक शुक्ला की कलम से
जीवन हो लाख विषाक्त मगर तुम न अशक्त बनो ,
काल के फन को रंगमंच बना तुम उस पर नृत्य करो ,,
विवेक शुक्ला की कलम से