Thursday, May 19, 2022

चाँद पर कविता

 



मेरे शहर से जरा सी दूरी पर है भवन मेरा ,

रास्तों की खूबसूरती पर लगता है मन मेरा ,,

चाँद दिखता सफर में जब शहर में होता गमन मेरा ,

सुना है कल से अमावस होगी कैसे लगेगा मन मेरा ,,


      विवेक शुक्ला की कलम से 



No comments:

Post a Comment