मेरे शहर से जरा सी दूरी पर है भवन मेरा ,
रास्तों की खूबसूरती पर लगता है मन मेरा ,,
चाँद दिखता सफर में जब शहर में होता गमन मेरा ,
सुना है कल से अमावस होगी कैसे लगेगा मन मेरा ,,
विवेक शुक्ला की कलम से
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