माना की मेरे हर शेरों में हसीना और शराब होती हैं ,
आदतन शायरों की हर बातें हुस्न की तलबदार होती हैं ,,
पर मेरी जां बातों से न परखा करो किरदार को मेरे ,
कुछ बातें हकीकत नहीं बस मौसमी बहार होती हैं ,,
विवेक शुक्ला की कलम से
माना की मेरे हर शेरों में हसीना और शराब होती हैं ,
आदतन शायरों की हर बातें हुस्न की तलबदार होती हैं ,,
पर मेरी जां बातों से न परखा करो किरदार को मेरे ,
कुछ बातें हकीकत नहीं बस मौसमी बहार होती हैं ,,
विवेक शुक्ला की कलम से
हर सुबह और शाम साथ में जिनके कटती हो ,
दिनभर साथ में जिनके खूब गुफ्तगू चलती हो ,,
क्या ख़ाक करते हैं वो भरोसा मेरे किरदार का ,
अगर उन्हें भी वफ़ा कहकर जतानी पड़ती हो ,,
विवेक शुक्ला की कलम से