जगाकर अपनी रातों को , क्यों ख़्वाब चाहत के बुनता है ,,
मतलब के सारे साथी हैं , यहां किसे तुम्हारी चिंता है ,,
कहते हैं सब अपनी अपनी , है कौन तुझे जो सुनता है ,,
मन के एकाकीपन में , दिल सम्मति यही सब गुनता है ,,
विवेक शुक्ला की कलम से
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