Tuesday, May 24, 2022

अकेलेपन पर कविता

 




जगाकर अपनी रातों को , क्यों ख़्वाब चाहत के बुनता है ,,

मतलब के सारे साथी हैं , यहां किसे तुम्हारी चिंता है ,,

कहते हैं सब अपनी अपनी , है कौन तुझे जो सुनता है ,,

मन के एकाकीपन में , दिल सम्मति यही सब गुनता है ,,


              विवेक शुक्ला की कलम से 







No comments:

Post a Comment