सिर्फ हमीं डटे हैं लठ्ठ लेके सरहद पर ,
बाकी यहाँ किसी में जान थोड़ी है ,,
बड़े आराम से जो बैठे हैं बेफिकर घरों में ,
उन्हें लगता है कि उनका नुकसान थोड़ी है ,,
आएंगे सांड तो चरेंगे और खेत भी ,
इस जमीं में सिर्फ हमारा धान थोड़ी है ,,
विवेक शुक्ला की कलम से
