बदलेगा हर शख्स यहाँ , लाज़िम है कल या आज बदले ,
वक़्त की दास्तां में हजारों तख्त और ताज बदले ,,
कुछ ने बदलने को ही समझी वक़्त की नज़ाक़त ,
कुछ ग़फ़लत में रहे , और फिर बेवक़्त बदले ,,
एक वक़्त बड़ी शिद्दत से जो लगे रहे बदलने में मुझे ,
सितम ये कि मुझे बदलकर , उनके फिर ख्याल बदले ,,
विवेक शुक्ला की कलम से
