बिजली कटौती पर कविता
जो तुम हो पास तो ज़िंदगी में रोशनी है ,
वर्ना हर तरफ अंधेरा है गर्मी है बेचैनी है ,,
मगर न जाने कहाँ रहती हो तुम आजकल ,
इंतज़ार करते करते दिन जाता है निकल ,,
रात भर रहते हैं बेचैन तुम्हारे इंतज़ार में ,
आके भी तुम रुकती नहीं एकबार में ,,
24 घण्टे रहने के वादे थे अखबार में ,
भुला दिया तुमने आते ही सरकार में ,,
विवेक शुक्ला की कलम से

No comments:
Post a Comment