Friday, September 20, 2024

वक़्त की दास्तां में हजारों तख्त और ताज बदले

 



बदलेगा हर शख्स यहाँ , लाज़िम है कल या आज बदले ,

वक़्त की दास्तां में हजारों तख्त और ताज बदले ,,

कुछ ने बदलने को ही समझी वक़्त की नज़ाक़त ,

कुछ ग़फ़लत में रहे , और फिर बेवक़्त बदले ,,

एक वक़्त बड़ी शिद्दत से जो लगे रहे बदलने में मुझे ,

सितम ये कि मुझे बदलकर , उनके फिर ख्याल बदले ,,


विवेक शुक्ला की कलम से 


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