माना की मेरे हर शेरों में हसीना और शराब होती हैं ,
आदतन शायरों की हर बातें हुस्न की तलबदार होती हैं ,,
पर मेरी जां बातों से न परखा करो किरदार को मेरे ,
कुछ बातें हकीकत नहीं बस मौसमी बहार होती हैं ,,
विवेक शुक्ला की कलम से
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