Tuesday, August 22, 2023

लाखों चोट खाएं बैठें हैं

 



जो हसीनों के ख्वाबों में रातें बिताएं बैठें हैं

वही दर्द की महफिलों में लाइनें लगाएं बैठें हैं

हमने तो सोचा था कि एक हमी हैं दुनिया में 

मुशायरें में पहुँचा तो जाना लाखों दिल पर चोट खाये बैठें हैं 

विवेक शुक्ला की कलम से





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