और सैलाब आ गया,
जमे थके खून में,
अब उबाल आ गय।
रोक न सकोगे मुझे अब,
चाहे आखरी साँस तक ले लो,
मेरे सपनों में,
अब इंक़लाब आ गया।
तोड़ न सकोगे,
मेरे इरादों को यूँ आसानी से,
मुझे देशप्रेम का ,
अब बुखार आ गया।
माँ भारती के लाडलों,
अब तो नींद से जागो,
दुश्मन तो सीमा के,
हर छोर पर आ गया।
कब तक मुंह छुपा के,
नज़रें तुम झुकाओगे,
कब तुम इस जवानी को,
देश के काम लाओगे।
छोड़ो, जाने दो,
मुझे क्या?
हमारी जिंदगी तो अच्छे से कट रही है,
तो हमें क्या?
यही कहा होगा उन लोगों ने,
जो गुलाम हो गए,
जिन्हें आज़ादी दिलाते-दिलाते
वीरों के सिर कलम हो गए।
अब भी रंग-भेद ,जाति और
मज़हब की बेड़ियों में बंधे हो क्या?
अभी भी इतिहास की
तुम उन्ही सीढ़ियों में खड़े हो क्या?
मैं पूछता हूँ तुमसे,
तुम कब आगे बढ़ोगे?
कब तुम गांव, शहर छोड़ के
देश के लिए लड़ोगे?
जागो !
ये नींद बार-बार नहीं खुलती,
जिंदगी एक बार मिली है,
ये बार-बार नहीं मिलती।
अपनी इस उम्र को,
एक नया जूनून दो,
अगर देश मांग रहा है,
तो तुम भी खून दो।
गिरी बस एक बूँद ज़मीन पर,
और सैलाब आ गया,
जमे थके खून में,
अब उबाल आ गया।
रोक न सकोगे हमें अब,
चाहे आखरी साँस तक ले लो,
हमारे सपनों में,
अब इंक़लाब आ गया।
तोड़ न सकोगे,
हमारे इरादों को यूँ आसानी से,
हमें देशप्रेम का,
अब बुखार आ गया।
प्रीतम तिवारी जी की कविता

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